सम्मान, प्रेम, प्रतिष्ठा, समर्पण सब रेत के दूर्ग है, पल भर में सब ढह जाते हैं।

सम्मान, प्रतिष्ठा ,इज्जत वगरह ऐसी चीजें है जिसका वास्तविक कोई एग्जिसटेंस नही रहता है,बस एक कोई बात आपसे ये चीज छीन सकती है और और वापस भी दिला सकती है। और ये सब ज्यादातर बाहर वालों पर निर्भर करता है कि वो आपको सम्मान दे या फिर नहीं। तो इनको रेत का दुर्ग इस लिये कहा है कि ये बस इंसान को भ्रम मे रखते है और इंसान फालतू ही इसको वास्तविक मान के उसपे अहंकार करने लग जाता है और जब एक बार अहंकार आ जाता तो उसे ये सब खोने का भय रहता और हमेशा इनको बचा के रखना चाहता और उसके लिये बहुत सारे गलत निर्णय लेता है। खुद तो दुख भोगता पर समाज तथा परीवार को भी दुख पहुंचाता और चूंकि ये रेत के बने है जो एक दिन तो वैसे भी टूट जाने है देर सवेर। तो उस समय ये रियलाईज होता है कि जो भी फालतू के काम किये, गलत निर्णय लिये उसकी तो आवश्यक्ता ही नही थी। अगर कोई डिसिजन्स सम्मान और प्रतिष्ठा की लालसा के बिना अपने विवेक से लिया होता तो कितने जीवन सुख से भर जाते और सही मार्ग पर चल के दूसरो के लिये मार्गदर्शक बनते और उसकी वजह से आत्मविश्वास बढ़ता और वो आत्मविश्वास मन को आनंद देता और प्रतिष्ठा तो तब भी मिल जाती पर सुख के साथ। तो पहले वाली स्थिति से तो कहीं अधिक अच्छी ये वाली स्थिति है। सब कुछ है जिसकी लालसा थी पर साथ मे सुख तथा आत्मविश्वास भी, ना कि भय और अहंकार

समर्पण और प्रेम भी इसी प्रकार जब अहंकार बन जाते है तो ये भी मोह का कारण बन जाते हैं और विवेक हर जाता है। इनको भी व्यक्ति बचा के रखने के लिये व्यर्थ प्रयास करता है, गलत निर्णय लेता है, मृगतृष्णा के पीछे जीवन भर भागता। दुख भोगता, पर मिलता कुछ नही और दूसरों को भी दुख पहुंचाता।

और हर व्यक्ति को ये रियालिज हो ही जाता है देर सवेर कि उसका जीवन मिथ्या सिद्धांतों पर बना है। परंतु जब ये भान होता तब तक वो इन सब के भंवर जाल में फस जाता है और उसके हाथ से सब चीजें निकल जाया करती है। कुछ लोग ये सब स्वीकार कर पाते है,और कईयों में ये हिम्मत ही नही होती कि सत्य को स्वीकार कर पायें और अपनी गलतियां स्वीकार करें।

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